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गांव भवरानी का इतिहास

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गाव भवराणी तहसील आहोर
जिला जालोर राजस्थान
आज जालोर जिले का ऐतिहासिक गाव भवराणी का इतिहास आपके समक्ष रखने जा रहा हु

भवराणी:-

जालोर जिला मुख्यालय से व तहसील मुख्यालय आहोर से 30किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है
आहोर तहसील का सबसे बड़ा गाव है
इस गाँव मे लगभग 36 कॉम के लोगो का निवास है
भवराणी गाव में कुल राजपुरोहितो के 110 घर  है
जिनका विवरण:-
1.सांथूआ 40 घर
2.उदेश 20 घर
3.पांचलोड 10 घर
4.नंदवाना 15 घर
5.डावियाल 10 घर
6.राजगुरु10 घर
7.दुदावत 5 घर
सांथूआ का इतिहास
मोटलजी सांथूआ सांथू से अपने ससुराल जा रहे थे 
तभी बिस में भवराणी गाव में मोटलजी ने चौहान ठाकुर के वहा पड़ाव किया था
भवराणी सोनगरा चौहान राजपूतो का गाव था, उस समय पूरे जालोर जिले पर सोनगरा चौहानो का शासन था,तभी गाव के ठाकुर साहब ने कहा कि गुरुजी आप अभी यहां से अतिसिगर प्रस्थान कीजिये हमारे यहां वार होने वाली है ,उस समय मीणो का आतंक था, ओर वो लोग गावो पर आक्रमण करके पशु धन चुरा कर ले जाते थे,तभी मोटलजी सांथूआ ने कहा कि मैने आपके गाव का  अन्नजल ग्रहण किया है इसलिए में भी आपके साथ वार में अपना योगदान दूंगा, मोटलजी सांथूआ के साथ अपने गाँव सांथू से एक भील भी उनके साथ मे था,जब रात के समय मे मीणो द्वारा भवराणी पर वार किया गया उस समय मोटलजी सांथूआ ने अपनी वीरता का परिसय देते हुए युद्ध भूमि में लड़ते लड़ते शहीद हो गए, गाव के चौहान ठाकुर व भील भी वीरगती को  प्राप्त हुए,
श्री मोटलजी सांथूआ भवराणी में वीरगति को प्राप्त होने पर ये सूचना उनके ससुराल पहुचने पर उनकी धर्म पत्नी श्रीमती चम्पा कँवर पुत्री श्रीमान गंगारामजी पांचलोड उनके पिसे सती हुई, श्रीमती चम्पा कँवरजी पांचलोड विक्रम स्वत् 1307 वेशाग शुद 11 के दिन सती हुई,
ये सम्पूर्ण जानकारी रावजी के चोपड़े के अनुसार है,
हमारे गाँव के रावजी गाव ढाबर जिला पाली के निवासी है,
श्री मोटलजी सांथूआ का मंदिर गाँव से वाला (नदी) के ऊपर स्थित है
सती माता श्री चम्पा कँवरजी पांचलोड का मंदिर हमारे गांव के निवास स्थान के आम चोहटे पर स्थित है
इस मंदिर का निर्माण 3 साल पहले करवाया गया है
श्री मोटलजी सांथूआ व सोनगरा चौहान का मंदिर बना हुआ है उनको सांथूआ व चौहान मामोजी के नाम से पूजा जाता है!
जहा आज भी हर साल परिवार के लोग जागरण करते है
मीठी प्रसादी का भोग ही लगाया जाता है!
उस समय जालोर पर पृथ्वीराज सोनगरा चौहान का शासन था,
श्री मोटलजी सांथूआ के तीन पुत्र थे
श्रीमान डुंगरसिंहजी,करमचंदजी,पातोजी तीन भाई थे,
विक्रम स्वत 1307 में शासक पृथ्वीराज सोनगरा चौहान जालोर के द्वारा हमको जागीरी भवराणी में मोटलजी सांथूआ के तीनों पुत्रो को दी गई,
प्रथम पुत्र श्रीमान डूंगरसिंहजी को कहा कि आप अपनी धोती को पानी मे भिगोकर पहने जब तक धोती सुख जाएं उससे पूर्व मेरे घोड़े पर सवार होकर आप जितनी जमीन घेर सकते हो वो आपकी जागीरी होगी!
उस समय जालोर रोड से खण्डप रोड तक जागीरी सांथूओ को दी गई
उस क्षेत्र का नाम खोखरी व रेल के नाम से जाना जाता है!

राजपुरोहित रूपावास गांव के वीरो की गाथा

राजपुरोहित राजसिंह जी रुपावास भाग प्रथम
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पारिवारिक परिचय :-  राजसिंह जी के दादा जी बिजाजी दामावत घेवड़ा गाँव के  जागीरदार थे  , राजसिंह जी के पिता जी चोथ सिंह जी पांचवा गाँव के जागीरदार थे , आपके एक 
भाई नृसिंह जी थे 

दिल्ली दौरा :- आपके कुटुंबी भाई मूलराज जी के पौत्र कल्याण सिंह जी द्वारा आपके नाम का प्रस्ताव रखा गया था 
जिसके बाद राव मालदेव जी ने आपको दिल्ली शेरशाह सूरी
के साथ समझौता करने के लिए दल बल के साथ भेजा था
आप ने शेरशाह सूरी और मालदेव के बीच सफल समझौता कराया था, राज सिंह जी ने दिल्ली में  सूरी के साथ कई दिन बिताए , राज सिंह जी बहुत ही खूबसूरत ,विद्वान ,शांतिप्रिय, अच्छे जाने माने वकील
धार्मिक प्रवृति , वफादार, थे इसी कारण शेरशाह सूरी ने कहा कि खुदा ने आपको बहुत खूबसूरत बनाया है तो किस्मत भी 
बहुत अच्छी  होगी तो सूरी ने राजसिंह जी से कहा कि मै आपकी किस्मत आजमाना चाहता हूं कि ऊपर वाले ने आपकी किस्मत में किया लिखा है ओर चार गोणी  में अलग अलग धातु भारी गई और राजसिंह जी को कहा कि आप अपनी तलवार जिस गोणी पर रखोगे वह आपकी होगी इसमें से एक सोने की है आपको एक पर ही तलवार रखनी है तो राजसिंह जी ने अपने ईष्ट देव चारभुजा नाथ को याद करके एक पर तलवार रखी तो उसमें सोना निकला
सूरी खुश हुआ और कहा कि मुझे विश्वास था कि ऊपर वाले ने आपकी किस्मत में यही लिखा होगा ओर सोना राजसिंह को दिया गया और सुरी ने राजसिंह जी को पूछा कि आपके पास जागीर कितनी है तो उन्होंने बताया कि 4-5 गाँव है तो सुरी नाराज हो गया मालदेव पर कहा इतने बड़े बुद्धिजीवी आदमी के पास तो बहुत जागीर होनी चाहिए काम इतने बड़े बड़े कराते हैं और बदले में जागीर इनके कद के हिसाब से नहीं है आप इनको कम से कम 84 गाँव  देवो यह मेरा आदेश है तब मालदेव जी ने कहा कि पुरोहित जी को इतने सारे गाँव देना संभव नहीं है मै इनको कुछ गांव ओर से दूंगा तब सुरी ने कहा नहीं आप इनको 84 गाँव देवो जब तक राजसिंह जिंदा है तब तक गांव उनके बाद में आपके वापस  हो जाएंगे और मालदेव जी ने आदेश का पालन किया , राजसिंह जी को शेर शाह सूरी ने 500 बल सोना ओर एक निंबोरा दिया और निंबोरा ए हक़ भी दिया मतबल यह एक नगाड़ा होता था जिसको राजा महाराजा अपने राज्य  या कहीं बाहर जाते समय बजाते थे जिसे आसानी से पहचाना जाता था कि यह उनका नगाड़ा है लेकिन नगाड़ा ए हक़ पूरे भारत में बजा सकते थे जो राजसिंह जी को भी दिया गया था यह बजाने से 
सबको मालूम पड़ जाता की कोन आ रहे हैं ओर सुरी ने राजसिंह जी को आदेश भी दिया था कि आपका काफिला जिस नगर में रुकेगा वहा आपको लूटपाट करनी है यह हमारा रिवाज है आप हमारे सहयोगी मित्र है इसलिए इस रस्म को अदा करना जरूरी होता है 
राजसिंह जी दिल्ली से मारवाड़ की ओर रवाना हुए तब उन्होंने सोने की बोरी को तलवार से काट काट कर के सोने की मोहरे सड़क पर बिखेर दी और दिल्ली की गरीब जनता 
वो सोने की मोहरे लेने वालों की भीड़ उनके पीछे पीछे चल रही थी यह खबर जब शेर शाह सूरी को मिली तो वह गुस्सा हो गया और राजसिंह जी को वापस बुलाया की आप यह क्या कर रहे हों मैने तो सोना आपको दिया और आप सड़कों पर उछाल रहे हो यह हमारी तौहीन है , आपने ऐसा क्यों किया तब राजसिंह जी ने कहा कि मेरी किस्मत मै
तो सब कुछ लिखा है कोई चीज की कमी नहीं है तो में यह सोने की गोनी साथ ले जाने की बजाय गरीबों में बांटने का फैसला लिया इनके चेहरों पर खुशी देखना चाहता था कि कभी इनकी किस्मत भी खुल जाए मेरी वजह से तो मुझे अच्छा लगा और इस सोने पर मेरा अधिकार था मुझे इसको किस जगह पर काम लेना था यह भी मेरा अधिकार था तब सुरी
मान गया कि चलो गरीबो का भला हुआ आप कितने दानी पुरुष हो यह भी मुझे आज पता चल गया  अब आप ज़ावो
राजसिंह जी दिल्ली से आते समय रात्रि विश्राम टोंक में अपना पड़ाव डाला रात में सब निंद्रा में थे तब आकाशवाणी हुई कि हे वीर प्रोहित तुम मेरी इस नगरी को मत लूटना यहां के लोग मुसलमानों से बहुत दुखी है ओर प्रोहित किसी दीन दुखियों को नहीं लूटता यह प्रोहितो का कार्य नहीं है आपका कार्य परायो का हित करना है , अहित मत करना यह आवाज सिर्फ राजसिंह जी को ही सुनाई दे रही थी तब राजसिंह जी ने पूछा हे प्रभु आप कोन हो मै आपका आदेश 
मानता हूं तब आकाश वाणी हुई मै तुम्हारा इष्ट देव हूं तब राजसिंह जी ने कहा मेरे इष्ठ देव तो चारभुजा नाथ है तो उन्होंने कहा हां मैं वहीं हूं मेरा यहां मंदिर है तुम्हारे पड़ाव से उत्तर दिशा में एक पुराना मंदिर है मेरी पूजा पाठ कोई नहीं
करता मै अब यहां नहीं रहना चाहता हे प्रोहित तुम मुझे अपने साथ  ले चलो यह सुनकर राजसिंह जी प्रातः उस मंदिर में जाते है तो मंदिर मुस्लिमो द्वारा तोड़ा हुआ ओर जीर्ण शीर्ण अवस्था में होता है वे उस मूर्ति के दर्शन करने के बाद उसे उठाने लगते है पर मूर्ति हिलती भी नहीं तब वो मूर्ति खुद बोल पड़ती हैं कि हे वीर प्रोहित आप कल पीत वस्त्र पहन कर आना ओर हाथ आगे करना मै स्वयं तुम्हारे हाथों में आ  जाऊंगा तब राजसिंह अगले दिन वैसा ही करते हुए हाथ आगे करते है तो मूर्ति उनके हाथो में आ जाती है इतनी भारी मूर्ति 
उनको फूलों से भी हल्की लगती हैं राजसिंह उस मूर्ति को अपने साथ हाथी पर सवार होकर अपने हाथो में थाम कर 
मारवाड़ में रूपावास गाँव में एक छतरी बनाकर उसमें रख देते हैं कुछ समय के लिए, राजसिंह जी जोधपुर मालदेव जी को सारा घटना क्रम बताते हैं ओर उनको वापस राजा बनाते हैं तब राजसिंह जी को कुछ गाँव देते है ओर वे 84गाँव अलग से देते हैं लेकिन उन गांवों के बारे में पता नहीं चला कि वे कहा थे ओर कितने साल राजसिंह जी के पास थे राजसिंह जी ने चारभुजा के मंदिर का शुभ मुहूर्त  पंडितो से निकलवाया ओर गाँव  रूपावास 
में भव्य मंदिर बनाया ओर चारभुजा नाथ की मुंहबोली मूर्ति की स्थापना की  , राजसिंह जी ने इस मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा
में बहुत धन राशि खर्च की , प्रतिदिन अब रूपावास में चमत्कारिक मूर्ति की पूजा पाठ नियमित रूप से दिन में चार बार आरती होनी लगी प्रात: कालीन , सेवा की आरती, संध्या कालीन, ओर शयन आरती होनी लगी जो आज तक हो रही है 

निर्माण कार्य :- राजसिंह जी ने चारभुजा नाथ का मंदिर बनाया ओर उसी समय रावला (बड़ी पोल)ओर एक बहुत बढ़िया बावड़ी का निर्माण भी कराया गया बावड़ी को पत्थरों से पक्की बांधी गई और उसका नाम अपनी ठकुराईन के नाम
फूला दे के नाम फूल वाव रखा गया था , एक तालाब भी बनाया था जिसका नाम उनकी दूसरी ठकुराईन राजल दे के नाम पर रखा गया था , ओर एक रोज नियमित रूप से गरीबों को दान देने के लिए चोकी का निर्माण किया गया था जिसे 
धरमादा चोकी कहते है , कीर्ति स्थंब भी बनवाया था जो आज भी मौजूद है उस पर शिलालेख अंकित है 

धरमादा चोकी:- राजसिंह जी बहुत दानी पुरुष थे जब मंदिर की स्थापना की गई थी तब सम्पूर्ण राजपुरोहित समाज को आमंत्रित किया गया था ओर मंदिर स्थापना के बाद धरमादा चोकी राजसिंह जी ने अपने वजन के बराबर सोना व रूपा तोला , उनके बाद उनकी दोनों रानियों ने भी अपने वजन के बराबर सोना व रूपा  तौलकर गरीबों को दान कर दिया, इसी चौकी पर राजसिंह जी रोज गरीबों को दान देते थे इसलिए इस चोकी को धरमादा चौकी कहा जाने लगा आज भी यह चौकी रूपावास में है

जागीर गाँव :- राजसिंह जी के बारे में कहा जाता है कि इनको 
84गाँव  आजीवन यानी जब तक जीवित रहते है तब तक गाँव  उनके रहेंगे बाद में वापस जप्त हो जाएंगे इसीलिए यह गाँव  कहा थे ओर कितने साल राजसिंह जी के पास रहे कोई 
ठोस आधार नहीं मिला लेकिन इनको ओर भी गाँव  दिए गए थे जिनमें से प्रमुख रूपावास जिसे राव मालदेव जी द्वारा सोना निवेश ठिकाणा की मान्यता प्राप्त थी बाकी सभी गाँव  रूपावास ठिकाणे के अधीन थे कुछ गाँव  उनके वंश जो द्वारा बसाए गए थे , मोहराई, पांचवा, बांता , बड़ियालो, खातियो की बासनी आदि मोहराई गाँव  राजसिंह जी के पुत्र महेशदास जी ने संवत 1600 में बसाया था , पांचवा गाँव  में  भी  राजसिंह जी के वंशज रहते है

राजसिंह जी के पूर्वजों ओर वंशजों को एक चाट के माध्यम से 
समझते हैं 

           बिजड़ जी 
          हरपाल जी 
          दामा जी 
         बीजा जी
         चोथ जी 
_______1____________2__________
        राजसिंह जी      नृसिंह जी 
             ! 
_____1_______2___________3__________4___
-
वेरीसाल जी, महेश दास जी,  कान सिंह जी  ,रायसल जी
 
____________________________________________
                 वेरीसाल सिह जी 
                       !
 ___1___________2__________3______
जसराज जी  चांद सिंह जी।    रूप सिंह जी   

____________________________________________
             रायसल सिंह जी राजावत 
इनके 5 ठकुराईन ओर 14 पुत्र हुए थे कहा जाता हैं कि आठ 
 पुत्र बाल्यकाल में ही नहीं रहे शेष 6 पुत्रों की ओलाद हुई
ओर रूपावास ओर मोहराई में इनके वंशज आज भी रहते हैं
 
1. हेमराज सिंह जी  
2. सांवल सिंह जी 
3. जय सिंह जी 
 इन तीनों भाईयो की छतरीया रूपावास के नेनकिया तालाब पर आज भी है 
4. उदय सिंह इनकी छतरी सुमेल गिरी में है 
5. अचल दास जी 
6. ठाकुर दास जी 
अचल दास जी ओर ठाकुर दास जी के काका महेश दास जी निसंतान थे लेकिन महेश दास जी
ने मोहराई गाँव  बसाने के लिए अचल दास जी ओर ठाकुर दास जी को गोद लिया और उनको अपने साथ मोहराई ले गए और मोहराई गाँव बसाया था 

आज भी रूपावास में पांच हैंस (भाग) है जिनके नाम इस प्रकार है
1. हेमराज सिंह जी की बड़ी हैंस कहलाती है 
2. सांवल सिंह जी की हैंस 
3. उदय सिंह जी की हैंस 
4. जयसिंह जी की हैंस 
5. वेरीसाल जी की हैंस 
इन सभी हैंसो के दमामी अलग अलग है इसलिए रूपावास
में जब लड़की की शादी होती हैं तो सम्हेला में बारात का स्वागत सभी हैंस के दमामी अपने अपने ढोल बजाते हैं 
5 ढोल बजते हैं जो एक अपने आप में गाँव की विशेषता है
राजसिंह जी के पुत्रों के बारे में अलग से पोस्ट करेंगे 
राजसिंह जी के पुत्रों का भी गौरवशाली इतिहास रहा है इनके 
परिवार कई शूरवीर शहीद हुए ओर उनके पीछे सती भी हुए हैं जिसका विवरण इस लेख में दे देता हूं 

1.राजसिंह जी के पीछे उनकी दोनों रानिया फूलादे ओर राजल दे महासती हुए हैं
जिनकी छतरीया आज भी रूपावास गाँव में  बड़ा तालाब पर
है राजसिंह जी की छतरी है या नहीं इसके बारे में जानकारी प्राप्त नहीं हुई कि वे शहीद हुए थे या नहीं 

2.वेरीसाल सिंह जी राजावत आप भी शहीद हुए , आपकी 
   छतरी हिंगावास गाँव के तालाब पर हिंगावास ओर विरावास
   के बीच इनके तीन रानियां थीं , इनके पीछे तीनों रानियां  
     सती हुई थी जिनकी छतरीया आज भी तालाब के बंधे
    पर स्थित है     
   

3. कान सिंह जी राजावत  आप जोधपुर में शहीद हुए
    आपकी 
     घोड़ी राजकुमार को पसंद आ गई और आपने नहीं दी
    तो साजिश कर आपको धोखे  से मारकर घोड़ी ले ली
   इस घटना के बाद राजसिंह जी ने जोधपुर को त्याग दिया 
    था 

4. महेशदास जी राजावत आपका घोड़ा हंस भी जोधपुर
    दरबार को पसंद आ गया लेकिन आपके नहीं देने के 
   कारण आपका पीछा किया लेकिन आपने घोड़े का ओर 
   अपना सिर धड़ से अलग कर दिया आपकी ठकुरानी सती 
   हुई जिनकी छतरी मोहराई गाँव में है आपकी भी छतरी

   घोड़े हंस का चबूतरा मोहराई गाँव में  आज भी है 

5.  उदय सिंह  आप सुमेल गिरी के युद्ध में 
    प्रताप सिंह जी मूलराजोत के साथ शहीद हुए 
    इनकी छतरी भी बनी हुई है लेकिन अभी देखरेख ओर
    निगरानी में रखना बहुत जरूरी है 

6. हेमराज सिंह जी आपकी छतरी रूपावास में बनी है 

7. सांवल सिंह जी  आपकी छतरी भी रूपावास में बनी हुई हैं

8. जयसिंह जी आपकी छतरी भी रूपावास में बनी हुई हैं
 
 6,7,8, आप तीनों भाइयों की छतरी रूपावास के नेनकिया
  तालाब पर बनी हुई हैं यह तीनों भाई कहा शहीद हुए इनका 
  इतिहास  मालूम नहीं हो सका 

राजसिंह जी के पुत्रों ओर पोत्रो के पास अच्छे नस्ल के 
घोड़े थे जो जोधपुर दरबार के राजकुमारों को बहुत पसंद आते थे इसलिए उन्होंने राजसिंह जी के दो पुत्रों को घोड़ों के
लिए मार डाला 

दोहे:- १. राजसिंह जी आवे हाथी पर , रस्ते रुकिया रात ! 
             रात में आवाज आई, माने ले चालो साथ !! 
       
        २. खुद रे बराबर सोनो तोलियो वा जागा भी है उठे !
           धरमादा चौकी केवे , राजसिंह जेडा दानवीर कठे !! 


लेखक :- महेंद्र सिंह सेवड़ राजपुरोहित
           गांव :- ढण्ढोरा  तह: भोपालगढ़ 
          जिला :जोधपुर हाल: चेन्नई 
          संपर्क : 9840654779

संदर्भ : -  रूपावास  राव जी की बही के अनुसार कवि
            दलपत सिंह जी ने अपने हाथ से लिख कर रखे 
            पन्ने , 
            कवि दलपत सिंह जी ओर गजसा रूपावास  
            का विशेष सहयोग रहा है

विरांगना सुजा कवर का इतिहास

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राजस्थान की इस बहादुर स्त्री जिसने पुरूष वेश में स्थानीय लोगों का नेतृत्व किया और युद्ध में सेना का नेतृत्व करते हुए अंग्रेज सेना को हराकर भगा दिया राजस्थान की जनता को ये जानना जरूरी है। जिस प्रकार झांसी की रानी ने अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध संग्राम का शंखनाद किया ठीक उसी तरह वीरांगना सुजा राजपुरोहित ने राजस्थान में अंग्रेजी सेना का मुंहतोड़ जवाब दिया और विजेता रही। यदि वीरांगना सुजा को राजस्थान की लक्ष्मीबार्इ कह दिया जाये तो कोर्इ अतिश्योकित नहीं होगी। सुजाकंवर का जन्म 1837 के आसपास तत्कालीन मारवाड़ राज्य के लाडनू ठिकाने (वर्तमान में लाडनू शहर) में एक उच्च आदर्शो वाले परिवार में हुआ था। उनके पिता हनवंतसिंह राजपुरोहित के तत्कालीन ठिकाने का ठाकुर बहादुरसिंह राजपूत से मधुर और प्रगाढ़ संबंध थे। इसलिए ठाकुर परिवार के बच्चों के साथ रहते हुए सुजा ने बचपन में ही खेल-खेल में घुड़सवारी तथा तलवार, तीर और बंदुक चलाना सीख लिया। सुजा कितने आत्मसम्मान वाली शक्ति  स्वरूपा लड़की थी इसका परिचय तभी मिल गया जब 1854 में आसपास उनका विवाह तत्कालीन किशनगढ़ रियासत के अंतर्गत बिली गांव के बैजनाथ सिंह राजपुरोहित के साथ हुआ। विवाह के तुरन्त बाद जब वह अपने ससुराल जा रही थी और डाकुओं ने नवदंपती को घेर लिया और पति ने कह दिया कि आभूषण लुटेरों के हवाले कर दो तब उन्होने झट से पति की तलवार खींचकर डाकू सरदार को मार गिराया तथा अन्य को मार भगाया। मगर इसके साथ ही उन्होने अपने कायर पति के साथ जाने से इनकार कर दिया और जीवनपर्यन्त पुरुष वेश में जनसेवा में जुटने का संकल्प ले लिया। सन 1857 में अंग्रेजी सेना, जिसे काली-गारी सेना कहा जाता था की एक टुकड़ी ने लाडनू क्षेत्र में अचानक आक्रमण कर मारकाट शुरू कर दी। इसकी सूचना जब लाडनूं ठिकाने के ठाकुर बहादुरसिंह को लगी तो वे हतप्रभ रह गए। उनके पास विरोध का सामथ्र्य और सेना नहीं थी। ठाकुर बहादुरसिंह अपने विश्वस्त सिपाहियों के साथ इसी विषय पर बातचीर कर रहे थे कि अचानक मर्दाना वेश में घोड़े पर सवार वीरांगना सुजा कंवर ने अपने हाथ में लम्बछड़ बन्दूक लहराते हुए सिंह गर्जना कर कहा - ठाकुर साहब! आप हिम्मत रखो। जब तक आपकी यह बेटी सुजा राजपुरोहित जिंदा है तब तक काली-गोरी सेना तो क्या उसकी परछार्इ भी इस ठिकाने को छू नही सकती। शीघ्र ही वीरांगना सुजा के नेतृत्व में एक सेना का गठन किया गया। राहू दरवाजे पर मुख्य मोर्चा बनाया गया। काली-गोरी सेना ज्योंहि लाडनूं पर आक्रमण करना चाहती थी उसी वक्त वीरांगना सुजा राजपुरोहित रणचंडी का रूपधारण कर दुश्मन पर टूट पड़ी। दुश्मन सेना को इस बात का अहसास तक नहीं था कि यहां कोर्इ हमारा मुकाबला इस तरह कर सकता हैं। वीर और वीरांगनाओं की वीरता देखकर अंग्रेज सेना में हाहाकार मच गया। दुश्मन सैनिक प्राण बचाकर भागने लगे। मातृभूमि और आम जनता के प्राणों की रक्षार्थ इस संग्राम से यह सिद्ध हो गया कि भारतवासी अंग्रेजी सत्ता को जड़ से उखाड़कर फेंक देंगे। हालांकि इस संग्राम में लाडनूं के कर्इ वीर भी वीरगति को प्राप्त हुए, वीरांगना सुजा राजपुरोहित भी घायल हो गर्इ। अपने शौर्य का परचम लहराने वाली 20 वर्षीया वीरांगना सुजा राजपुरोहित अपने साथियों के साथ जयघोष करते हुए जब युद्ध जीतकर लौटी तो लाडनूं ठाकुर ने उन्हे राजस्थानी पाग पहनाकर सम्मानित किया। उन्हे तलवार भेंटकर सुजा राजपुरोहित की जगह वीर सूरजनसिंह राजपुरोहित का खिताब दिया। ठाकुर बहादुरसिंह ने वीरांगना का मान बढ़ाने हेतु कर्इ घोषणाएं की जिनमे मुख्य थी - सुजा सदैव मर्दाना वेश में अपनी कमर पर तलवार बांधे रहेंगी। सुजा के आने पर राजपरिवार सहित आम नागरिक खड़े होकर उन्हे सम्मान देंगे। आपसी झगड़ों, विशेषकर महिलाओं के झगड़ों का निबटारा करने हेतु सुजा का फैसला मान्य होगा और क्षेत्र में आयोजि होने वाले उत्सवों में सुजा को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाना आवश्यक होगा। 1902 के आस पास, इस महान वीरांगना सुजा राजपुरोहित का स्वर्गवास हो गया। आशा की जानी चाहिए कि सुजा के कारनामों पर और अधिक शोध होगा और उन्हे विस्मृत नहीं किया जाएगा

राजपुरोहितो का बलिदान


हा में राजपुरोहित हु

 में अगर अपना प्रमाण पत्र देखू, तो उसमे राजपुरोहित लिखा गया है। यधपि मारवाड़ आंचल के बहार  इस जाती के  बारे में कम लोग ही जानते हैं। तो में आपको इस जाती का ऐतिहासिक परिपेक्ष में जाकर जानकारी देना चाहता हूं। यधपी जिस वर्ग मे में जन्मा हूं, तो बताता हूं, हां मे राजपुरोहित हूं। ब्राह्मण वर्ग में जन्म लिया। युद्ध जैसे क्षत्रीयोशित कर्म भी किए। एक अनोखी जाती हूं, जिसमें ब्राह्मण के गुण और क्षत्रियों के कर्म दोनों स्थापित हैं।
 
खान-पान में मांस -मदिरा से सदा दूर रहता हूं, पर मारवाड़ में ऐसा कोई युद्ध नहीं लड़ा गया, जिसमें मेरी सहभागीता नहीं रही हो, गांव-गांव में प्यारे मारवाड़ के लिए लड़ा-कटा, मरा में, कभी गौ माता की रक्षा के लिए कभी नारी के सम्मान के लिए, शायद ही ऐसा कोई गांव हो जिसमे मेने मामाजी और सती के रूप में सत्य एवं न्याय कि रक्षा के हेतू, अपने प्राणों सर्ग ना किए हो, में कभी राजा तो नहीं रहा, लेकिन राठौड़ सता जोधपुर में स्थापित हुई, उसमे मेरा योगदान रहा है। जो आज भी स्वर्णीम अक्षरों में अंकीत है। राठौड़ो के आदीपुरूष राव सिंहजी के साथ राजपुरोहित देवपालजी बनकर आया। जिसका राठौड़ सता स्थापन में योगदान रहा। कभी प्रतापसिंह बनकर गिरी सुमेल के युद्ध में अप्रतीम सोर्य दिखाकर राव मालदेव का माथा ऊंचा किया। कभी दलपत सिंह बनकर धर्मत का युद्ध ओरंगजेब के खिलाफ लड़ा, जिस प्रकार में लड़ा उसको याद करके तत्कालीन महाराज जसवंतसिंह जी भी फुट-फुट कर रोए। कभी केसरसिंह बनके अहमदाबाद युद्ध में मारवाड़ की ओर से लड़ते हुए महाराज अभयसिंहजी को विजय श्री दिलवाई। कभी गुमानसिंह बनकर राजा मानसिंह के प्राण बचाएं। उन पर चले वार को  खुद के उपर लेकर प्राण त्याग दिए, लेकिन मारवाड़ का मान कायम रखा।  कभी बीकानेर में वीर जगराम जी बनकर बीकानेर की रक्षा की।
इसके बाद उनके राज परिवार का विवाह मेरे आशीर्वाद लेकर ही  संपन्न होता है। वैदिक काल की बात करे, तो मैने ब्रह्मवंशी दधीचि बनकर संसार की रक्षा हेतु अपनी हड्डियां तक दान दे दी। कभी परशुराम बनकर आतितायो का संगार किया। और अहंकार में मधमय में क्षुर राज वंशियो को मर्यादा का पाठ कराया। कभी द्रोणा बनकर पांडवो को धर्म की  स्थापना के लिए शिक्षित किया। फिर हजारों साल तक निर्धन रहा। भूखा -प्यासा रहा लेकिन सनातन की रक्षा के लिए वेदपुराण गा-गा कर सुनाता रहा,पर धर्म को जिवित रखा। फिर मध्यकाल के कालखंड में मेने चाणक्य बनकर अहंकार में डूबे धनानंद को पद चिद्घित कर चन्द्रगुप्त जैसे बालक को पदाचित किया।
और तभी मेरी सीखा खुली।
सरक संहिता और सूचुक संहिता जैसी पुस्तके मेने लोक कल्याण हेतु रची। जब मेरा इतिहास देखोगे, तो केवल और केवल त्याग दिखेगा। पाली की रक्षा हेतु पालीवाल बनकर लड़ा- मरा में पर स्वाभिमान पर आंच न आने दी। कभी अन्याय के विरूद्ध मैने एक क्षण में कुलधारा के 84 गांव त्याग दिए थे। मेने अपने मारवाड़ के प्रति कभी द्रोह नहीं किया, गद्दारी नहीं की। अभी भी आश्यकता आन पड़ी, तो में प्राण तक देने के लिए तत्पर रहूंगा। मेरे खून में केवल त्याग और त्याग है।